||अंदाज़||
निगाहों में हम जिसे बसा लेते हैं।
रोता हो कितना भी हंसा लेते हैं।
क्या मिलता है लोगों को फूलों से खुशबू चुराकर,
हम तो कांटों से अपना दामन सजा लेते हैं।
ना दीपक जलाते हैं और ना जुगनुओं से खेलते हैं,
उदासी के आलम में एक प्यार भरी धुन बजा लेते हैं।
हमें पसंद नहीं देखना पत्थर दिल की आंखों में भी आंसू,
लोग दूसरों के आंसुओं का मजा लेते हैं।
जिंदा है हम आज तक इसी अंदाज के कारण,
कि किनारों से खामोशियां, लहरों से सदा लेते है।
सुधीर मेघवाल
30 may 2005

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