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अंदाज़

                   ||अंदाज़|| निगाहों में हम जिसे बसा  लेते हैं।  रोता हो कितना भी हंसा लेते हैं। क्या मिलता है लोगों को फूलों से खुशबू चुराकर,  हम तो कांटों से अपना दामन सजा लेते हैं।  ना दीपक जलाते हैं और ना जुगनुओं से खेलते हैं,  उदासी के आलम में एक प्यार भरी धुन बजा लेते हैं।  हमें पसंद नहीं देखना पत्थर दिल की आंखों में भी आंसू,  लोग दूसरों के आंसुओं का मजा लेते हैं।  जिंदा है हम आज तक इसी अंदाज के कारण,  कि किनारों से खामोशियां, लहरों से सदा लेते है।  सुधीर मेघवाल 30 may 2005  

||शामिल नाम हमारा कर ले ||

                 ||शामिल नाम हमारा कर ले ||  ये इक गम गवारा कर ले,  अपने दोस्तों में शामिल नाम हमारा कर ले|  किस तरह ये वक़त बीता है,  इश्क़ में कैसे कोई मर के जीता है,  जब अपना कोई किनारा कर ले   ये इक गम गवारा कर ले,  अपने दोस्तों में शामिल नाम हमारा कर ले|  फायदा क्या है ज़िन्दगी में मौत की पनाह का,  ये इश्क़ तो नाम है इक गुनाह का,  पिछले जन्म में किया था आ ये गुनाह दोबारा कर ले,  ये इक गम गवारा कर ले,  अपने दोस्तों में शामिल नाम हमारा कर ले|  रुलाती रहेंगी महफ़िले तन्हाइयों की,  डराती रहेंगी तस्वीरें परछाइयों की,  ज़िन्दगी में शामिल प्यार हमारा कर ले   ये इक गम गवारा कर ले,  अपने दोस्तों में शामिल नाम हमारा कर ले||     -सुधीर मेघवाल        12 जुलाई 2005

|| ये रात वही हैं ||

                      || ये रात वही हैं ||  तेरी याद में गुजारी है जो ये रात वही है,  तुम छोड़कर गईं थी जो ये हालात वही है |  फिर कभी लबों पर आई नहीं,  तुमने अधूरी छोड़ी थी जो ये बात वही है |  आँखों के सिवा कहीं नमी नहीं है,  रुकी नहीं कभी जो ये बरसात वही है |  एक बार फिर वो सामने आए,  समझा नहीं जिन्हे तुमने ये जज्बात वही है |  बैठा हूँ कब से मैं चाँद के दीदार को,  चाँद को पसंद आई ना कभी जो ये रात वही है |  समझ आया ना खेल शय और मात का,  "सुधीर" जीत रास आई ना जिसके बाद ये मात वही है ||           -सुधीर मेघवाल            03 मार्च 2005