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||अंधेरों से मोहब्बत हो गईं है||

                  ||अंधेरों से मोहब्बत हो गईं है||

शबनमी लबों पे शोख मुस्कान क़यामत सी हो गई है,

डर लगता है उजालो से, अंधेरों से मोहब्बत सी हो गई है |

चाहकर भी रुक नहीं पाते है कदम,

तेरी ही चाहत रखता है दिल हरदम,

इस दिल की मुझसे बगावत सी हो गई है 

डर लगता है उजालो से, अंधेरों से मोहब्बत सी हो गई है |

भुला देना चाहता हूँ तुझसे जुड़ीं हर याद,

एक लम्हा चैन से जीया नहीं मैंने तुझसे मोहब्बत करने के बाद,

हर पल बैचैन रहने की आदत सी हो गई है 

डर लगता है उजालो से, अंधेरों से मोहब्बत सी हो गई है |

अब तो ऐसा लगता है मैं जी ना पाउँगा तेरे बिन,

जरा खुद से पूछ के देख क्या जी पाओगी तुम मेरे बिन,

ये किस्मत से कैसी शरारत सी हो गई है 

डर लगता है उजालो से, अंधेरों से मोहब्बत सी हो गई है |

सागर के दो किनारे कभी मिलते नहीं ये जानता हूँ  मैं,

हम दोनों है वो किनारे ये मानता हूँ मैं,

दो किनारो के प्यार की शहादत सी हो गई है 

डर लगता है उजालो से, अंधेरों से मोहब्बत सी हो गई है |

कितने भी दीये जला लो मुझको रोशनी दे ना पाओगी तुम,

जिधर से भी गुजरोगी मुझको ही पाओगी तुम,

तेरे कदमो में मर मिटने की चाहत सी हो गई है 

डर लगता है उजालो से, अंधेरों से मोहब्बत सी हो गई है |

कभी तन्हा रहकर देखिए तन्हाई क्या है,

बुरे लोगो से पूछना क्या भलाई क्या है,

बुरा हूँ लेकिन भलाई की इबादत सी हो गई है 

डर लगता है उजालो से, अंधेरों से मोहब्बत सी हो गई है |

वो सामने खड़े मेरे ऐसे मुस्करा रहे है,

झील सी नीली आँखों से मुझे बुला रहे है,

"सुधीर" सपने देखना तेरी आदत सी हो गई है 

डर लगता है उजालो से, अंधेरों से मोहब्बत सी हो गई है |

शबनमी लबों पे शोख मुस्कान क़यामत सी हो गई है||

-सुधीर मेघवाल 

30 अक्टूबर 2005


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