|| हार ||
खाई हजार ठोकरें पर एक बार नहीं मानी,
बहुत समझाया मैंने पर जिंदगी ने हार नहीं मानी।
देख सके मेरी निगाहें इतना उजाला कहां से लाऊं ,
दे सके पनाह मेरे अरमानों को ऐसा रखवाला कहां से लाऊं,
कभी बलखाती कटार, कभी तलवार नहीं मानी,
बहुत समझाया मैंने पर जिंदगी ने हार नहीं मानी।
लहरें छोड़ सागर को किनारों के पास लौट आती,
मेरी एक आवाज पर वह शायद वापस लौट आती,
कभी चूड़े की खनक, कभी पायल की झंकार नहीं मानी,
बहुत समझाया मैंने पर जिंदगी ने हार नहीं मानी।
चाहकर भी भुला ना पाया आखिरी पैगाम तुम्हारा,
बहुत चाहा ना लिखूं कलाई पर नाम तुम्हारा,
क्या करूं पर खंजर की धार नहीं मानी,
बहुत समझाया मैंने पर जिंदगी ने हार नहीं मानी।
शतरंज जिंदगी की जीत कर भी हार के,
बैठे हैं पतझड़ में देवता बहार के,
सजाना जो चाहा गुलशन रंग बदलती बहार नहीं मानी,
बहुत समझाया मैंने पर जिंदगी ने हार नहीं मानी ||
सुधीर मेघवाल
15 may 2006

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